मैंग्रोव लवण-सहिष्णु तटीय वन होते हैं, जो ज्वारीय क्षेत्रों, मुहानों और डेल्टाओं में पाए जाते हैं। ये स्थल और समुद्र के बीच प्राकृतिक कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। लेकिन बढ़ते मानवीय दबाव और पर्यावरणीय परिवर्तनों के कारण इनका क्षरण हो रहा है, जिससे तटीय पारिस्थितिकी और स्थानीय आजीविका पर खतरा उत्पन्न हो रहा है।
मैंग्रोव का क्षरण मुख्यतः मानवीय गतिविधियों और पर्यावरणीय दबावों के कारण हो रहा है। तटीय भूमि पुनरुद्धार, नगरीय विस्तार, बंदरगाह, पर्यटन अवसंरचना और झींगा पालन मैंग्रोव क्षेत्रों को व्यावसायिक भूमि उपयोग में बदल देते हैं।
उद्योगों और सीवेज से होने वाला प्रदूषण, ईंधन लकड़ी का अत्यधिक दोहन, मीठे पानी के प्रवाह में कमी, गाद जमाव, चक्रवात, समुद्र-स्तर वृद्धि और लवणता में परिवर्तन भी मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र को और अधिक कमजोर करते हैं।
मैंग्रोव चक्रवात, ज्वारीय लहरों, तूफानी ज्वार और तटीय कटाव के विरुद्ध प्राकृतिक जैव-कवच के रूप में कार्य करते हैं। इनकी घनी जड़ प्रणाली अवसादों को फँसाती है, तटरेखा को स्थिर करती है और जल की गुणवत्ता में सुधार करती है।
ये मछलियों, झींगों, केकड़ों और पक्षियों के लिए प्रजनन तथा नर्सरी स्थल के रूप में कार्य करते हैं, जिससे समुद्री जैव विविधता और स्थानीय आजीविका को सहारा मिलता है। मैंग्रोव बड़ी मात्रा में ब्लू कार्बन का भंडारण भी करते हैं, जिससे जलवायु नियंत्रण और तटीय सहनशीलता में सहायता मिलती है।
इस प्रकार, मैंग्रोव का संरक्षण केवल जैव विविधता के लिए ही नहीं, बल्कि आपदा सहनशीलता, जलवायु संतुलन, आजीविका सुरक्षा और सतत तटीय विकास के लिए भी आवश्यक है।