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GS-3 • 2024
15 marks • 250 words

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15 Marks • 250 Words
भारत में पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र कौन-कौन से हैं? इनके संरक्षण के लिए भारत सरकार की नीतियों का उल्लेख कीजिए।
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Syllabus: Environmental pollution and degradation, environmental impact assessment. 15 marks 250 words 7 min focus timer
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Model Answer Framework
हिंदी मॉडल उत्तर
HI
परिचय (Introduction)

1 भूमिका

पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र वे क्षेत्र हैं, जिनका पारिस्थितिक महत्त्व बहुत अधिक होता है, जहाँ जैव विविधता समृद्ध होती है, पारिस्थितिकी तंत्र नाजुक होता है या पर्यावरणीय क्षरण की संभावना अधिक होती है। इनका संरक्षण जैव विविधता, जलवायु स्थिरता, जल सुरक्षा और सतत विकास के लिए आवश्यक है।

मुख्य भाग: पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र और संरक्षण नीतियाँ

फ्लो चार्ट: भारत में पारिस्थितिक संवेदनशीलता

पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र

नाजुक क्षेत्र

हिमालय
पश्चिमी घाट
द्वीप

जैव विविधता क्षेत्र

वन
आर्द्रभूमियाँ
वन्यजीव आवास

तटीय पारितंत्र

मैंग्रोव
प्रवाल भित्तियाँ
मुहाने

आवश्यकता: संरक्षण, विनियमित विकास और सामुदायिक भागीदारी। 

1. भारत के प्रमुख पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र

  • हिमालयी क्षेत्र: नाजुक पर्वत, हिमनद, वन और नदियों के स्रोत।

  • पश्चिमी घाट: उच्च स्थानिकता और समृद्ध वन-संपदा वाला जैव विविधता हॉटस्पॉट।

  • उत्तर-पूर्वी क्षेत्र: समृद्ध वन, वन्यजीव आवास और जनजातीय पारितंत्र।

  • सुंदरबन और मैंग्रोव: तटीय सुरक्षा और जैव विविधता के लिए महत्त्वपूर्ण।

  • प्रवाल भित्तियाँ: लक्षद्वीप, मन्नार की खाड़ी, अंडमान-निकोबार और कच्छ की खाड़ी में पाई जाती हैं।

  • आर्द्रभूमियाँ और रामसर स्थल: प्रवासी पक्षियों, जल सुरक्षा और बाढ़ नियंत्रण के लिए महत्त्वपूर्ण।

  • मरुस्थलीय और अर्ध-शुष्क पारितंत्र: जैसे थार मरुस्थल और घासभूमियाँ, जहाँ विशिष्ट जैव विविधता पाई जाती है।

  • संरक्षित क्षेत्रों के आसपास के ईको-सेंसिटिव जोन: राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास के बफर क्षेत्र।

2. संरक्षण के लिए भारत सरकार की नीतियाँ

  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: सरकार को ईको-सेंसिटिव जोन अधिसूचित करने और हानिकारक गतिविधियों को विनियमित करने की शक्ति देता है।

  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों, संरक्षण रिजर्व और सामुदायिक रिजर्व के माध्यम से संरक्षण प्रदान करता है।

  • वन संरक्षण ढाँचा: वन भूमि के गैर-वन उपयोग में परिवर्तन को नियंत्रित करता है और प्रतिपूरक वनीकरण को बढ़ावा देता है।

  • जैव विविधता अधिनियम, 2002: संरक्षण, सतत उपयोग और लाभ-साझेदारी के माध्यम से जैव विविधता की रक्षा करता है।

  • तटीय विनियमन क्षेत्र मानदंड: मैंग्रोव, समुद्र तटों, मुहानों और समुद्री पारितंत्रों की रक्षा के लिए तटीय क्षेत्रों में विकास को विनियमित करते हैं।

  • आर्द्रभूमि नियम, 2017: आर्द्रभूमियों की पहचान, अधिसूचना और संरक्षण के लिए ढाँचा प्रदान करते हैं।

  • राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना: वन, हिमालय, जल और सतत आवास से संबंधित मिशनों के माध्यम से पारितंत्र संरक्षण को बढ़ावा देती है।

  • ईको-सेंसिटिव जोन अधिसूचनाएँ: संरक्षित क्षेत्रों के पास खनन, प्रदूषणकारी उद्योग, अनियंत्रित निर्माण और अन्य विनाशकारी गतिविधियों को प्रतिबंधित करती हैं।

निष्कर्ष

इस प्रकार, भारत के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र जैव विविधता, जल सुरक्षा, जलवायु सहनशीलता और आजीविका सहायता के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इनके संरक्षण के लिए मजबूत कानूनों, वैज्ञानिक योजना और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के माध्यम से संरक्षण और विकास के बीच संतुलन आवश्यक है।

निष्कर्ष (Conclusion)

 

Syllabus Anchoring
General Studies III → Environment and Biodiversity
सामान्य अध्ययन III → पर्यावरण और जैव विविधता
Environmental pollution and degradation, environmental impact assessment.
पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन।
Asked in: 2024 (1 PYQ)
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